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Han mai dekh raha tha Maa A poem by goku

हाँ मैं देख रहा था माँ!  By - gokuhathi


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दोस्तों ये कविता मैंने अपनी माँ यानी दादी माँ के लिए लिखी है जो अब इस दुनियां मे नहीं हैं! कविता बहुत अच्छी है मेरा वादा है आपको कविता पसंद आएगी!
एक बार वीडियो को जरूर देखे अगर पसंद ना आये तो बेशक वीडियो को dislike कर दीजियेगा!
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कविता लिखित मे पढ़ने के लिये नीचे जाये!
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-: हाँ मैं देख रहा था माँ... By gokuhathi
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मैंने देखा है, हाँ मैंने देखा है,
मैंने देखा है तुझे धूप मे चलते,
मैंने देखा है, तुझे आँखों को मलते,
मैंने देखा है, खुद को तेरी गोद मे पलते,
और मैंने देखा है अब तुझे आग मे जलते!
हाँ माँ मैंने देखा है अब तुझे आग मे जलते!!
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मैं देख रहा था पापा की आंखे,
वे सूख चुकी थी नमी को बहाके,
मैं सुन भी रहा था उन सभी की बाते,
जो चले जा रहे थे तुझे कांधो पर उठा के,
बताओ ना माँ, तुम कहाँ जा रहे थे..
बताओ ना माँ, तुम कहाँ जा रहे थे,
और क्यूँ मम्मी, बुआ, पापा रो रहे थे!
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हाँ मैं देख रहा था, बस चुप्पी सी बांधे,
अपनी नज़रे, निगाहेँ, आंखे तुम पे सांधे,
तुम चुप सी पड़ी थी, सब चिल्लाह रहे थे,
उठा कर ज़मीं से तुम्हे नेहला रहे थे,
क्यूँ सर को तुम्हारे सब सेहला रहे थे,
"सब ठीक है" ये कह कर, मुझे बेहला रहे थे!
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हाँ, मैं देख रहा था, बस देख रहा था,
हाँ मैं देख रहा था, वो सेहमा सा मंज़र,
जब लेटाया उठा कर तुम्हे अर्थी के अंदर,
उस धूप और गर्मी मे, सब जल रहे थे,
तो इतनी चादरों से तुम्हे क्यूँ ढक रहे थे!
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फिर सजा कर डोली तुम्हारी, उन्होंने मुझे भी बुलाया,
सबसे पहले मैंने ही तुम्हे कांधो पर उठाया,
दो कदम ही चला था, ले लिया तुमको मुझसे,
मैं अब सोच ही रहा था, तुम आओगी ना फिर से,
कुछ कहाँ ना सुना, तुम्हे लकड़ियों पर रख दिया था,
ऐसा लगा मेरी आँखों को ढक  दिया था!
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फिर पलकें उठी तो तुम जल रहे थे,
और पापा किसी के शीने से लग के रो रहे थे!
हाँ माँ मैं वही पर खड़ा सब कुछ देख रहा था,
तुम्हारी जलती चिता से रूह को सेक रहा था!
हाँ मैं देख रहा था वो सेहमा सा मंज़र,
जो आँखों मे मेरी चुभा रहा था खंज़र!
हाँ मैं देख रहा था वो सेहमा सा मंज़र,
हाँ माँ मैं देख रहा था..............
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हमारे इस blog को पढ़ने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद!
:- Gokuhathi.